सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी विश्वविद्यालय को बाद में अवैध या बंद घोषित किए जाने से पहले दी गई डिग्रियां वैध रहेंगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक विश्वविद्यालय कानून के तहत कार्यरत था और उसे मान्यता प्राप्त थी, उस दौरान प्राप्त डिग्रियों को बाद की कानूनी प्रक्रिया के आधार पर अमान्य नहीं किया जा सकता।
यह मामला बिहार के उन लाइब्रेरियन से जुड़ा था, जिनकी सेवा उनकी डिग्री के आधार पर समाप्त कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए संबंधित कर्मचारियों को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया, हालांकि पिछली अवधि का वेतन देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि छात्रों और कर्मचारियों को उन परिस्थितियों का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए, जो उनके नियंत्रण से बाहर थीं। यह फैसला ऐसे मामलों में बड़ी राहत माना जा रहा है, जहां विश्वविद्यालयों को बाद में बंद या अवैध घोषित किया गया।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी यूनिवर्सिटी को बाद में अवैध या बंद घोषित किए जाने से पहले दी गई डिग्रियां अमान्य नहीं होंगी। कोर्ट ने कहा कि जब तक यूनिवर्सिटी कानून के तहत कार्यरत थी और उसे मान्यता प्राप्त थी, उस दौरान प्राप्त डिग्रियां वैध मानी जाएंगी।
यह फैसला बिहार के उन लाइब्रेरियन के मामले में आया है, जिनकी सेवा इस आधार पर समाप्त कर दी गई थी कि उनकी डिग्री ऐसी यूनिवर्सिटी से थी, जिसे बाद में बंद घोषित कर दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद छत्तीसगढ़ निजी क्षेत्र विश्वविद्यालय अधिनियम, 2002 से जुड़ा है। इस अधिनियम के तहत कई निजी विश्वविद्यालय स्थापित किए गए थे।
साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने Prof. Yashpal vs State of Chhattisgarh मामले में 2002 के अधिनियम के मुख्य प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद संबंधित विश्वविद्यालयों को बंद करने का आदेश दिया गया।
हालांकि, कोर्ट ने उस समय पढ़ रहे छात्रों और पहले ही डिग्री प्राप्त कर चुके छात्रों के हितों की सुरक्षा की थी।
बिहार सरकार का फैसला और हाईकोर्ट का रुख
बिहार सरकार ने 2010 में कुछ लाइब्रेरियन की सेवा इस आधार पर समाप्त कर दी कि उनकी डिग्री ऐसे विश्वविद्यालय से थी, जिसका मूल अधिनियम बाद में रद्द कर दिया गया था।
पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराया। इसके खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में की गई।
सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने पटना हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा:
जिस समय अपीलकर्ताओं ने पढ़ाई की, उस समय विश्वविद्यालय वैध रूप से स्थापित था।
उस अवधि में प्राप्त डिग्रियों को बाद की कानूनी परिस्थितियों के आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
अपीलकर्ताओं को सेवा से हटाना अनुचित है।
कोर्ट ने संबंधित लाइब्रेरियन को दोबारा सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, पिछली अवधि का वेतन (बैक सैलरी) देने से इनकार कर दिया गया।
केस का शीर्षक
PRIYANKA KUMARI AND ORS. VERSUS THE STATE OF BIHAR AND ORS. (with connected matters)
फैसले का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय उन हजारों छात्रों और कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है, जिन्होंने ऐसे विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त की थी जिन्हें बाद में बंद या अवैध घोषित किया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला ‘वैध अपेक्षा’ (Legitimate Expectation) और ‘न्यायसंगतता’ (Fairness) के सिद्धांत को मजबूत करता है।
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