JSSC पर हाईकोर्ट सख्त: हैकिंग पर FIR क्यों नहीं? उठे बड़े सवाल

झारखंड में JSSC माध्यमिक आचार्य परीक्षा विवाद पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पूछा कि हैकिंग की आशंका होने के बावजूद FIR क्यों दर्ज नहीं की गई। करीब 2,819 अभ्यर्थियों के सिस्टम में गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद आयोग ने पुनर्परीक्षा का फैसला लिया, जिसे छात्रों ने चुनौती दी है। हाई कोर्ट ने कहा कि बिना दोषियों की पहचान किए सभी को दोबारा परीक्षा में शामिल करना उचित नहीं है। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल 2026 को होगी।
📍 रांची | BLive News
झारखंड में JSSC (झारखंड कर्मचारी चयन आयोग) द्वारा आयोजित माध्यमिक आचार्य नियुक्ति परीक्षा एक बार फिर विवादों में घिर गई है। इस मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए आयोग से कई अहम सवाल पूछे हैं।
⚖️ हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाई कोर्ट में जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सुनवाई के दौरान पूछा कि यदि परीक्षा में हैकिंग या बाहरी हस्तक्षेप की आशंका थी, तो संबंधित लोगों के खिलाफ FIR दर्ज क्यों नहीं की गई।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना दोषियों की पहचान किए सभी अभ्यर्थियों को एक साथ दोबारा परीक्षा में शामिल करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
📊 2,819 अभ्यर्थियों पर सवाल
आयोग के अनुसार, परीक्षा में करीब 25,000 अभ्यर्थी शामिल हुए थे, जिनमें से लगभग 2,819 अभ्यर्थियों के सिस्टम में बाहरी प्रभाव के संकेत मिले थे। इसके आधार पर उनके उत्तर लॉक कर दिए गए और पुनर्परीक्षा का निर्णय लिया गया।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि
बिना ठोस जांच और व्यक्तिगत दोष तय किए सभी को दोषी मानना गलत है।
📝 अभ्यर्थियों की दलील
अभ्यर्थियों की ओर से अदालत में कहा गया कि आयोग ने
बिना किसी स्पष्ट प्रमाण के
- न तो परीक्षा केंद्रों की जिम्मेदारी तय की
- न ही संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान की
फिर भी हजारों छात्रों को दोबारा परीक्षा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
🔍 आयोग का पक्ष
आयोग की ओर से बताया गया कि परीक्षा ऑनलाइन मोड में हुई थी और किसी भी तरह की गड़बड़ी पकड़ने के लिए सिस्टम में विशेष तकनीकी व्यवस्था की गई थी।
फिर भी कुछ अभ्यर्थियों के सिस्टम में असामान्य गतिविधियां मिलने के बाद यह कदम उठाया गया।
📅 अगली सुनवाई
इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल 2026 को तय की गई है, जहां आयोग को अपने जवाब के साथ अदालत में उपस्थित होना होगा।
🔥 BLive Bottom Line
BLive पहले भी इस मुद्दे को उठा चुका है।
अब हाई कोर्ट के सख्त रुख के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या बिना ठोस जांच के हजारों छात्रों का भविष्य दांव पर लगाया जा सकता है?
